दोपहर का वक़्त था। सारा गाँव खाने के बाद नींद में डूबा हुआ था। पंखे की धीमी-धीमी आवाज़ और बाहर आम के पेड़ पर बैठे कोयल की सुस्त कू-कू — सब कुछ जैसे ठहर सा गया था।
नेहा खिड़की के पास बैठी थी, उसकी उंगलियाँ पुराने रेडियो की घुंडी पर घूम रही थीं, पर मन कहीं और था।
चार साल बाद वो अपने गाँव लौटी थी। दिल्ली की पढ़ाई, शोर, और तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बाद ये सन्नाटा नया नहीं, पर कुछ गहरा लग रहा था — जैसे किसी पुराने घाव की परतें खुल रही हों।
"इतनी गर्मी में कहाँ जा रही है बिटिया?" माँ ने नींद में करवट बदलते हुए पूछा।
"बस... बाहर थोड़ी हवा खाने," नेहा ने कहा और चुपचाप ओढ़नी संभालकर घर से बाहर निकल पड़ी।
वो सीधे पहुँची सामने वाले खेत की तरफ — जहाँ रघु काका का घर था। पापा के पुराने दोस्त। उम्र में बड़े, पर अब भी सख़्त और गठीले। गाँव में उनकी खामोशी और अकेलेपन की कहानियाँ बहुत मशहूर थीं।
दरवाज़ा खुला था। बरामदे में बैठकर वो कुछ लकड़ी तराश रहे थे। नेहा की आहट पर उन्होंने सिर उठाया, और हल्की मुस्कान दी — वैसी ही जैसे कोई भूला हुआ रिश्ता मुस्कुरा दे।
"अरे बिटिया... तू कब आई?"
"कल रात... माँ ने बताया नहीं?"
"बूढ़ा हो गया हूँ शायद... अब सब याद नहीं रहता," रघु की आवाज़ भारी थी, पर थकी नहीं।
नेहा धीरे-धीरे उनके पास बैठ गई। उनके हाथ की नसें, वो पुराने पत्थर की छेनी, और आसपास फैली गर्मी — सब कुछ उसे अजीब-सा महसूस हो रहा था। एक ठहराव... जो अंदर कुछ हिला रहा था।
"चाय पिएगी?"
उसने सिर हिलाया।
और जैसे ही वो उठने लगे, नेहा ने हल्के से उनकी कलाई थाम ली।
बिना कुछ कहे।
बस थाम लिया — जैसे कुछ बिखरने से पहले थाम लेना ज़रूरी हो।

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