रघु ने हाथ रोक लिया। नेहा की उँगलियाँ उसकी कलाई पर ऐसे थीं, जैसे कोई बच्चा बारिश में भीगती तितली को थामे — डरते हुए कि वो उड़ न जाए।
कुछ पल वैसे ही चुपचाप बीते।
बरामदे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और दूर से आती कोयल की टूक-टूक थी।
“ठीक हो न?” रघु ने हल्की आवाज़ में पूछा, लेकिन आँखें अब भी उसी स्पर्श पर रुकी थीं।
“बस... थोड़ी देर यहीं बैठना है,” नेहा ने धीमे से कहा।
आवाज़ में वो थकावट थी जो शरीर की नहीं होती — वो किसी लंबे इंतज़ार की तरह भारी थी।रघु कुछ नहीं बोला। सिर्फ खुद को थोड़ा पीछे खिसका लिया, ताकि नेहा पास बैठ सके।
वो बैठी। उनकी कुहनी से उसकी बाँह छू गई — हल्की, सधी हुई, लेकिन भीतर कहीं कुछ हिला देने वाली।
“तुम अब भी वही लकड़ी तराशते हो?”
“अब यही तो बचा है,” रघु ने मुस्कराकर कहा। “लकड़ियाँ चुपचाप सुन लेती हैं… लोग नहीं।”
नेहा ने उसकी ओर देखा — उस चेहरे की झुर्रियों में जैसे कोई पुरानी कविता पड़ी हो।
उसने धीरे से पूछा, “क्या कभी किसी ने तुम्हें समझा?”
रघु ने एक पल उसकी तरफ देखा — कुछ कहने के लिए नहीं, बस देखने के लिए।
“कभी-कभी लगता है... कोई समझने ही नहीं आया,” उसने कहा, और जैसे ही वो फिर से छेनी उठाने लगा — नेहा ने उसके हाथ को अपने हाथों में भर लिया।
अबकी बार उसने छोड़ा नहीं।

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